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इस विषय के श्लोक

मृत्यु

  • 82 श्लोक
1.36अर्जुन

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन। पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः।।1.36।।

nihatya dhārtarāṣhṭrān naḥ kā prītiḥ syāj janārdana pāpam evāśhrayed asmān hatvaitān ātatāyinaḥ

।।1.36।। हे जनार्दन! इन धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों को मारकर हमलोगों को क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारने से तो हमें पाप ही लगेगा।

1.40अर्जुन

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः। धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत।।1.40।।

kula-kṣhaye praṇaśhyanti kula-dharmāḥ sanātanāḥ dharme naṣhṭe kulaṁ kṛitsnam adharmo ’bhibhavaty uta

।।1.40।। कुल का क्षय होने पर सदा से चलते आये कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं और धर्म का नाश होनेपर (बचे हुए) सम्पूर्ण कुल को अधर्म दबा लेता है।

1.43अर्जुन

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः। उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः।।1.43।।

doṣhair etaiḥ kula-ghnānāṁ varṇa-saṅkara-kārakaiḥ utsādyante jāti-dharmāḥ kula-dharmāśh cha śhāśhvatāḥ

।।1.43।। इन वर्णसंकर पैदा करनेवाले दोषोंसे कुलघातियों के सदा से चलते आये कुलधर्म और जातिधर्म नष्ट हो जाते हैं।

2.11श्रीकृष्ण

श्री भगवानुवाच अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे। गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।।2.11।।

śhrī bhagavān uvācha aśhochyān-anvaśhochas-tvaṁ prajñā-vādānśh cha bhāṣhase gatāsūn-agatāsūnśh-cha nānuśhochanti paṇḍitāḥ

।।2.11।। श्रीभगवान् बोले - तुमने शोक न करनेयोग्यका शोक किया है और  पण्डिताईकी बातें कह रहे हो; परन्तु जिनके प्राण चले गये हैं, उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये हैं, उनके लिये पण्डितलोग शोक नहीं करते।

ज्ञानभयजीवनमृत्युशब्दार्थ एवं भाष्य
2.15श्रीकृष्ण

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते।।2.15।।

yaṁ hi na vyathayantyete puruṣhaṁ puruṣharṣhabha sama-duḥkha-sukhaṁ dhīraṁ so ’mṛitatvāya kalpate

।।2.15।। कारण कि हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! सुख-दुःखमें सम रहनेवाले जिस धीर मनुष्यको ये मात्रास्पर्श (पदार्थ) व्यथित (सुखी-दुःखी) नहीं कर पाते, वह अमर होनेमें समर्थ हो जाता है अर्थात् वह अमर हो जाता है।

2.17श्रीकृष्ण

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्। विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति।।2.17।।

avināśhi tu tadviddhi yena sarvam idaṁ tatam vināśham avyayasyāsya na kaśhchit kartum arhati

।।2.17।। अविनाशी तो उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है। इस अविनाशीका विनाश कोई भी नहीं कर सकता।

2.18श्रीकृष्ण

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः। अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत।।2.18।।

antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śharīriṇaḥ anāśhino ’prameyasya tasmād yudhyasva bhārata

।।2.18।। अविनाशी, अप्रमेय और नित्य रहनेवाले इस शरीरी के ये देह अन्तवाले कहे गये हैं। इसलिये हे अर्जुन! तुम युद्ध करो।

2.19श्रीकृष्ण

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।।2.19।।

ya enaṁ vetti hantāraṁ yaśh chainaṁ manyate hatam ubhau tau na vijānīto nāyaṁ hanti na hanyate

।।2.19।। जो मनुष्य इस अविनाशी शरीरीको मारनेवाला मानता है और जो मनुष्य इसको मरा मानता है, वे दोनों ही इसको नहीं जानते; क्योंकि यह न मारता है और न मारा जाता है।

2.20श्रीकृष्ण

न जायते म्रियते वा कदाचि न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।2.20।।

na jāyate mriyate vā kadāchin nāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ ajo nityaḥ śhāśhvato ’yaṁ purāṇo na hanyate hanyamāne śharīre

।।2.20।। यह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है। यह जन्मरहित, नित्य-निरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और पुराण (अनादि) है। शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता।

2.21श्रीकृष्ण

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्। कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्।।2.21।।

vedāvināśhinaṁ nityaṁ ya enam ajam avyayam kathaṁ sa puruṣhaḥ pārtha kaṁ ghātayati hanti kam

।।2.21।। हे पृथानन्दन! जो मनुष्य इस शरीरीको अविनाशी, नित्य, जन्मरहित और अव्यय जानता है, वह कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये?

2.22श्रीकृष्ण

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।2.22।।

vāsānsi jīrṇāni yathā vihāya navāni gṛihṇāti naro ’parāṇi tathā śharīrāṇi vihāya jīrṇānya nyāni sanyāti navāni dehī

।।2.22।। मनुष्य जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़े धारण कर लेता है, ऐसे ही देही पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंमें चला जाता है।

2.27श्रीकृष्ण

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।2.27।।

jātasya hi dhruvo mṛityur dhruvaṁ janma mṛitasya cha tasmād aparihārye ’rthe na tvaṁ śhochitum arhasi

।।2.27।। क्योंकि पैदा हुएकी जरूर मृत्यु होगी और मरे हुएका जरूर जन्म होगा। इस (जन्म-मरण-रूप परिवर्तन के प्रवाह) का परिहार अर्थात् निवारण नहीं हो सकता। अतः इस विषयमें तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।

2.30श्रीकृष्ण

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत। तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि।।2.30।।

dehī nityam avadhyo ’yaṁ dehe sarvasya bhārata tasmāt sarvāṇi bhūtāni na tvaṁ śhochitum arhasi

।।2.30।। हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! सबके देहमें यह देही नित्य ही अवध्य है। इसलिये सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अर्थात् किसी भी प्राणीके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।

2.34श्रीकृष्ण

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्। संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।।2.34।।

akīrtiṁ chāpi bhūtāni kathayiṣhyanti te ’vyayām sambhāvitasya chākīrtir maraṇād atirichyate

।।2.34।। और सब प्राणी भी तेरी सदा रहनेवाली अपकीर्तिका कथन अर्थात निंदा करेंगे। वह अपकीर्ति सम्मानित मनुष्यके लिये मृत्युसे भी बढ़कर दुःखदायी होती है।

2.37श्रीकृष्ण

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः।।2.37।।

hato vā prāpsyasi swargaṁ jitvā vā bhokṣhyase mahīm tasmād uttiṣhṭha kaunteya yuddhāya kṛita-niśhchayaḥ

।।2.37।। अगर युद्धमें तू मारा जायगा तो तुझे स्वर्गकी प्राप्ति होगी और अगर युद्धमें तू जीत जायगा तो पृथ्वीका राज्य भोगेगा। अतः हे कुन्तीनन्दन! तू युद्धके लिये निश्चय करके खड़ा हो जा।

3.15श्रीकृष्ण

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्।।3.15।।

karma brahmodbhavaṁ viddhi brahmākṣhara-samudbhavam tasmāt sarva-gataṁ brahma nityaṁ yajñe pratiṣhṭhitam

।।3.14 -- 3.15।। सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्न  वर्षासे होती है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान। इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) में नित्य प्रतिष्ठित है।

कर्ममृत्युक्रियाशब्दार्थ एवं भाष्य
3.24श्रीकृष्ण

उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्। सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः।।3.24।।

utsīdeyur ime lokā na kuryāṁ karma ched aham sankarasya cha kartā syām upahanyām imāḥ prajāḥ

।।3.23 -- 3.24।।  हे पार्थ ! अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्य-कर्म न करूँ (तो बड़ी हानि हो जाय; क्योंकि) मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं। यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं वर्णसंकरताको करनेवाला  तथा इस समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूँ।

कर्ममृत्युक्रियाशब्दार्थ एवं भाष्य
3.35श्रीकृष्ण

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।3.35।।

śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt swa-dharme nidhanaṁ śhreyaḥ para-dharmo bhayāvahaḥ

।।3.35।। अच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।

कर्मधर्मभयमृत्युशब्दार्थ एवं भाष्य
4.1श्रीकृष्ण

श्री भगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।4.1।।

śhrī bhagavān uvācha imaṁ vivasvate yogaṁ proktavān aham avyayam vivasvān manave prāha manur ikṣhvākave ’bravīt

।।4.1।। श्रीभगवान् बोले - मैंने इस अविनाशी योगको सूर्यसे कहा था। फिर सूर्यने (अपने पुत्र) वैवस्वत मनुसे कहा और मनुने (अपने पुत्र) राजा इक्ष्वाकुसे कहा।

योगधर्ममृत्युशब्दार्थ एवं भाष्य
4.6श्रीकृष्ण

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया।।4.6।।

ajo ’pi sannavyayātmā bhūtānām īśhvaro ’pi san prakṛitiṁ svām adhiṣhṭhāya sambhavāmyātma-māyayā

।।4.6।। मैं अजन्मा और अविनाशी-स्वरूप होते हुए भी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता हूँ।

4.16श्रीकृष्ण

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।4.16।।

kiṁ karma kim akarmeti kavayo ’pyatra mohitāḥ tat te karma pravakṣhyāmi yaj jñātvā mokṣhyase ’śhubhāt

।।4.16।। कर्म क्या है और अकर्म क्या है -- इस प्रकार इस विषयमें विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं। अतः वह कर्म-तत्त्व मैं तुम्हें भलीभाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ- (संसार-बन्धन-) से मुक्त हो जायगा।

कर्मजीवनमृत्युक्रियाशब्दार्थ एवं भाष्य
4.31श्रीकृष्ण

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतो़ऽन्यः कुरुसत्तम।।4.31।।

yajña-śhiṣhṭāmṛita-bhujo yānti brahma sanātanam nāyaṁ loko ’styayajñasya kuto ’nyaḥ kuru-sattama

।।4.31।। हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! यज्ञसे बचे हुए अमृतका अनुभव करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करनेवाले मनुष्यके लिये यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक होगा?

मृत्युक्रियाशब्दार्थ एवं भाष्य
6.38अर्जुन

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति। अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि।।6.38।।

kachchin nobhaya-vibhraṣhṭaśh chhinnābhram iva naśhyati apratiṣhṭho mahā-bāho vimūḍho brahmaṇaḥ pathi

।।6.38।। हे महाबाहो ! संसारके आश्रयसे रहित और परमात्मप्राप्तिके मार्गमें मोहित अर्थात् विचलित -- इस तरह दोनों ओरसे भ्रष्ट हुआ साधक क्या छिन्न-भिन्न बादलकी तरह नष्ट तो नहीं हो जाता ?

7.25श्रीकृष्ण

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः। मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्।।7.25।।

nāhaṁ prakāśhaḥ sarvasya yoga-māyā-samāvṛitaḥ mūḍho ’yaṁ nābhijānāti loko mām ajam avyayam

।।7.25।। जो मूढ़ मनुष्य मेरेको अज और अविनाशी ठीक तरहसे नहीं जानते (मानते), उन सबके सामने योगमायासे अच्छी तरहसे आवृत हुआ मैं प्रकट नहीं होता।

योगजीवनमृत्युशब्दार्थ एवं भाष्य
7.29श्रीकृष्ण

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्।।7.29।।

jarā-maraṇa-mokṣhāya mām āśhritya yatanti ye te brahma tadviduḥ kṛitsnam adhyātmaṁ karma chākhilam

।।7.29।।  जरा (वृद्धावस्था) और मरण (मृत्यु) से मोक्ष पानेके लिये जो  मेरा आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्मको, सम्पूर्ण अध्यात्मको और सम्पूर्ण कर्मको भी जान जाते हैं।

कर्मज्ञानमृत्युक्रियाशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
7.30श्रीकृष्ण

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः। प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः।।7.30।।

sādhibhūtādhidaivaṁ māṁ sādhiyajñaṁ cha ye viduḥ prayāṇa-kāle ’pi cha māṁ te vidur yukta-chetasaḥ

।।7.30।। जो मनुष्य अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित मुझे जानते हैं, वे युक्तचेता मनुष्य अन्तकालमें भी मुझे ही जानते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं।

मनजीवनमृत्युशब्दार्थ एवं भाष्य
8.2अर्जुन

अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन। प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः।।8.2।।

adhiyajñaḥ kathaṁ ko ’tra dehe ’smin madhusūdana prayāṇa-kāle cha kathaṁ jñeyo ’si niyatātmabhiḥ

।।8.1 -- 8.2।। अर्जुन बोले -- हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत किसको कहा गया है? और अधिदैव किसको कहा जाता है? यहाँ अधियज्ञ कौन है और वह इस देहमें कैसे है? हे मधूसूदन ! नियतात्मा (वशीभूत अन्तःकरणवाले) मनुष्यके द्वारा अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं?

ज्ञानमृत्युविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
8.3श्रीकृष्ण

श्री भगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः।।8.3।।

śhrī bhagavān uvācha akṣharaṁ brahma paramaṁ svabhāvo ’dhyātmam uchyate bhūta-bhāvodbhava-karo visargaḥ karma-sanjñitaḥ

।।8.3।। श्रीभगवान् बोले -- परम अक्षर ब्रह्म है और जीवका अपना जो होनापन है, उसको अध्यात्म कहते हैं। प्राणियों का उद्भव (सत्ता को प्रकट) करनेवाला जो त्याग है उसको कर्म कहा जाता है।

कर्मज्ञानधर्ममृत्युक्रियाशब्दार्थ एवं भाष्य
8.4श्रीकृष्ण

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्। अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर।।8.4।।

adhibhūtaṁ kṣharo bhāvaḥ puruṣhaśh chādhidaivatam adhiyajño ’ham evātra dehe deha-bhṛitāṁ vara

।।8.4।। हे देहधारियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! क्षरभाव अर्थात् नाशवान् पदार्थको अधिभूत कहते हैं, पुरुष अर्थात् हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी अधिदैव हैं और इस देहमें अन्तर्यामीरूपसे मैं ही अधियज्ञ हूँ।

8.5श्रीकृष्ण

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः।।8.5।।

anta-kāle cha mām eva smaran muktvā kalevaram yaḥ prayāti sa mad-bhāvaṁ yāti nāstyatra sanśhayaḥ

।।8.5।। जो मनुष्य अन्तकालमें भी मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे स्वरुप को ही प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है।

8.6श्रीकृष्ण

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।।8.6।।

yaṁ yaṁ vāpi smaran bhāvaṁ tyajatyante kalevaram taṁ tam evaiti kaunteya sadā tad-bhāva-bhāvitaḥ

।।8.6।। हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भावका स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है वह उस (अन्तकालके) भावसे सदा भावित होता हुआ उस-उसको ही प्राप्त होता है अर्थात् उस-उस योनिमें ही चला जाता है।

8.10श्रीकृष्ण

प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव। भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्।।8.10।।

prayāṇa-kāle manasāchalena bhaktyā yukto yoga-balena chaiva bhruvor madhye prāṇam āveśhya samyak sa taṁ paraṁ puruṣham upaiti divyam

।।8.10।। वह भक्तियुक्त मनुष्य अन्तसमयमें अचल मनसे और योगबलके द्वारा भृकुटीके मध्यमें प्राणोंको अच्छी तरहसे प्रविष्ट करके (शरीर छोड़नेपर) उस परम दिव्य पुरुषको ही प्राप्त होता है।

भक्तियोगमनध्यानजीवनमृत्युशब्दार्थ एवं भाष्य
8.11श्रीकृष्ण

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये।।8.11।।

yad akṣharaṁ veda-vido vadanti viśhanti yad yatayo vīta-rāgāḥ yad ichchhanto brahmacharyaṁ charanti tat te padaṁ saṅgraheṇa pravakṣhye

।।8.11।। वेदवेत्ता लोग जिसको अक्षर कहते हैं, वीतराग यति जिसको प्राप्त करते हैं और साधक जिसकी प्राप्तिकी इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, वह पद मैं तेरे लिये संक्षेपसे कहूँगा।

मृत्युक्रियाशब्दार्थ एवं भाष्य
8.15श्रीकृष्ण

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्। नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः।।8.15।।

mām upetya punar janma duḥkhālayam aśhāśhvatam nāpnuvanti mahātmānaḥ sansiddhiṁ paramāṁ gatāḥ

।।8.15।। महात्मालोग मुझे प्राप्त करके दुःखालय और अशाश्वत पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होते; क्योंकि वे परमसिद्धिको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् उनको परम प्रेमकी प्राप्ति हो गयी है।

8.20श्रीकृष्ण

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः। यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति।।8.20।।

paras tasmāt tu bhāvo ’nyo ’vyakto ’vyaktāt sanātanaḥ yaḥ sa sarveṣhu bhūteṣhu naśhyatsu na vinaśhyati

।।8.20।। परन्तु उस अव्यक्त- (ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीर-) से अन्य अनादि सर्वश्रेष्ठ भावरूप जो अव्यक्त है, उसका सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नाश नहीं होता।

मृत्युविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
8.21श्रीकृष्ण

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।8.21।।

avyakto ’kṣhara ityuktas tam āhuḥ paramāṁ gatim yaṁ prāpya na nivartante tad dhāma paramaṁ mama

।।8.21।। उसीको अव्यक्त और अक्षर कहा गया है और उसीको परमगति कहा गया है तथा जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है।

मृत्युविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
9.2श्रीकृष्ण

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्। प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्।।9.2।।

rāja-vidyā rāja-guhyaṁ pavitram idam uttamam pratyakṣhāvagamaṁ dharmyaṁ su-sukhaṁ kartum avyayam

।।9.2।। यह सम्पूर्ण विद्याओंका और सम्पूर्ण गोपनीयोंका राजा है। यह अति पवित्र तथा अतिश्रेष्ठ है और इसका फल भी प्रत्यक्ष है। यह धर्ममय है, अविनाशी है और करनेमें बहुत सुगम है अर्थात् इसको प्राप्त करना बहुत सुगम है।

ज्ञानधर्ममृत्युक्रियाशब्दार्थ एवं भाष्य
9.3श्रीकृष्ण

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप। अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि।।9.3।।

aśhraddadhānāḥ puruṣhā dharmasyāsya parantapa aprāpya māṁ nivartante mṛityu-samsāra-vartmani

।।9.3।। हे परंतप! इस धर्मकी महिमापर श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य मेरे प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसारके मार्गमें लौटते रहते हैं अर्थात् बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं।

धर्मसमर्पणमृत्युशब्दार्थ एवं भाष्य
9.13श्रीकृष्ण

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्।।9.13।।

mahātmānas tu māṁ pārtha daivīṁ prakṛitim āśhritāḥ bhajantyananya-manaso jñātvā bhūtādim avyayam

।।9.13।। परन्तु हे पृथानन्दन ! दैवी प्रकृतिके आश्रित अनन्यमनवाले महात्मालोग मुझे सम्पूर्ण प्राणियोंका आदि और अविनाशी समझकर मेरा भजन करते हैं।

भक्तिमनमृत्युशब्दार्थ एवं भाष्य
9.18श्रीकृष्ण

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्।।9.18।।

gatir bhartā prabhuḥ sākṣhī nivāsaḥ śharaṇaṁ suhṛit prabhavaḥ pralayaḥ sthānaṁ nidhānaṁ bījam avyayam

।।9.16 -- 9.18।।  क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ। जाननेयोग्य पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत्का पिता, धाता, माता, पितामह, गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, आश्रय, सुहृद्, उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान तथा अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ।

9.19श्रीकृष्ण

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन।।9.19।।

tapāmyaham ahaṁ varṣhaṁ nigṛihṇāmyutsṛijāmi cha amṛitaṁ chaiva mṛityuśh cha sad asach chāham arjuna

।।9.19।। हे अर्जुन ! (संसारके हितके लिये) मैं ही सूर्यरूपसे तपता हूँ, जलको ग्रहण करता हूँ और फिर उस जलको वर्षारूपसे बरसा देता हूँ। (और तो क्या कहूँ) अमृत और मृत्यु तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।

9.21श्रीकृष्ण

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। एव त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते।।9.21।।

te taṁ bhuktvā swarga-lokaṁ viśhālaṁ kṣhīṇe puṇye martya-lokaṁ viśhanti evaṁ trayī-dharmam anuprapannā gatāgataṁ kāma-kāmā labhante

।।9.21।। वे उस विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आ जाते हैं। इस प्रकार तीनों वेदोंमें कहे हुए सकाम धर्मका आश्रय लिये हुए भोगोंकी कामना करनेवाले मनुष्य आवागमनको प्राप्त होते हैं।

9.24श्रीकृष्ण

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते।।9.24।।

ahaṁ hi sarva-yajñānāṁ bhoktā cha prabhureva cha na tu mām abhijānanti tattvenātaśh chyavanti te

।।9.24।। क्योंकि मैं ही सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और स्वामी भी हूँ;  परन्तु वे मेरेको तत्त्वसे नहीं जानते, इसीसे उनका पतन होता है।

मृत्युविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
9.31श्रीकृष्ण

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति।।9.31।।

kṣhipraṁ bhavati dharmātmā śhaśhvach-chhāntiṁ nigachchhati kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśhyati

।।9.31।। वह तत्काल (उसी क्षण) धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है। हे कुन्तीनन्दन ! तुम प्रतिज्ञा करो कि मेरे भक्तका विनाश (पतन) नहीं होता।

भक्तिधर्मशांतिमृत्युशब्दार्थ एवं भाष्य
10.3श्रीकृष्ण

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्। असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते।।10.3।।

yo māmajam anādiṁ cha vetti loka-maheśhvaram asammūḍhaḥ sa martyeṣhu sarva-pāpaiḥ pramuchyate

।।10.3।। जो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर जानता है अर्थात् दृढ़तासे मानता है, वह मनुष्योंमें असम्मूढ़ (जानकार) है और वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है।

10.4श्रीकृष्ण

बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः। सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च।।10.4।।

buddhir jñānam asammohaḥ kṣhamā satyaṁ damaḥ śhamaḥ sukhaṁ duḥkhaṁ bhavo ’bhāvo bhayaṁ chābhayameva cha

।।10.4 -- 10.5।। बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुःख, भव, अभाव, भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश -- प्राणियोंके ये अनेक प्रकारके और अलग-अलग (बीस) भाव मेरेसे ही होते हैं।

ज्ञानभयमनशांतिजीवनमृत्युविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
10.18अर्जुन

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन। भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्।।10.18।।

vistareṇātmano yogaṁ vibhūtiṁ cha janārdana bhūyaḥ kathaya tṛiptir hi śhṛiṇvato nāsti me ’mṛitam

।।10.18।। हे जनार्दन ! आप अपने योग (सामर्थ्य) को और विभूतियोंको विस्तारसे फिर कहिये; क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनते-सुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है।

योगजीवनमृत्युशब्दार्थ एवं भाष्य
10.29श्रीकृष्ण

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्। पितृ़णामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्।।10.29।।

anantaśh chāsmi nāgānāṁ varuṇo yādasām aham pitṝīṇām aryamā chāsmi yamaḥ sanyamatām aham

।।10.29।। नागोंमें अनन्त (शेषनाग) और जल-जन्तुओंका अधिपति वरुण मैं हूँ। पितरोंमें अर्यमा और शासन करनेवालोंमें यमराज मैं हूँ।

नेतृत्वमृत्युशब्दार्थ एवं भाष्य
10.34श्रीकृष्ण

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्। कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा।।10.34।।

mṛityuḥ sarva-haraśh chāham udbhavaśh cha bhaviṣhyatām kīrtiḥ śhrīr vāk cha nārīṇāṁ smṛitir medhā dhṛitiḥ kṣhamā

।।10.34।। सबका हरण करनेवाली मृत्यु और उत्पन्न होनेवालोंका उभ्दव मैं हूँ तथा स्त्री-जातिमें कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा मैं हूँ।

11.4अर्जुन

मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो। योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम्।।11.4।।

manyase yadi tach chhakyaṁ mayā draṣhṭum iti prabho yogeśhvara tato me tvaṁ darśhayātmānam avyayam

।।11.4।। हे प्रभो ! मेरे द्वारा आपका वह परम ऐश्वर रूप देखा जा सकता है -- ऐसा अगर आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर ! आप अपने उस अविनाशी स्वरूपको मुझे दिखा दीजिये।

11.8श्रीकृष्ण

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा। दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्।।11.8।।

na tu māṁ śhakyase draṣhṭum anenaiva sva-chakṣhuṣhā divyaṁ dadāmi te chakṣhuḥ paśhya me yogam aiśhwaram

।।11.8।। परन्तु तू अपनी इस आँखसे अर्थात् चर्मचक्षुसे मेरेको देख ही नहीं सकता, इसलिये मैं तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ, जिससे तू मेरी ईश्वर-सम्बन्धी सामर्थ्यको देख।

11.18अर्जुन

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे।।11.18।।

tvam akṣharaṁ paramaṁ veditavyaṁ tvam asya viśhvasya paraṁ nidhānam tvam avyayaḥ śhāśhvata-dharma-goptā sanātanas tvaṁ puruṣho mato me

।।11.18।। आप ही जाननेयोग्य परम अक्षर (अक्षरब्रह्म) हैं, आप ही इस सम्पूर्ण विश्वके परम आश्रय हैं, आप ही सनातनधर्मके रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं -- ऐसा मैं मानता हूँ।

धर्मजीवनमृत्युविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
11.32श्रीकृष्ण

श्री भगवानुवाच कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः। ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः।।11.32।।

śhrī-bhagavān uvācha kālo ’smi loka-kṣhaya-kṛit pravṛiddho lokān samāhartum iha pravṛittaḥ ṛite ’pi tvāṁ na bhaviṣhyanti sarve ye ’vasthitāḥ pratyanīkeṣhu yodhāḥ

।।11.32।। श्रीभगवान् बोले -- मैं सम्पूर्ण लोकोंका क्षय करनेवाला बढ़ा हुआ काल हूँ और इस समय मैं इन सब लोगोंका संहार करनेके लिये यहाँ आया हूँ। तुम्हारे प्रतिपक्षमें जो योद्धालोग खड़े हैं, वे सब तुम्हारे युद्ध किये बिना भी नहीं रहेंगे।

11.33श्रीकृष्ण

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्। मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।।11.33।।

tasmāt tvam uttiṣhṭha yaśho labhasva jitvā śhatrūn bhuṅkṣhva rājyaṁ samṛiddham mayaivaite nihatāḥ pūrvam eva nimitta-mātraṁ bhava savya-sāchin

।।11.33।। इसलिये तुम युद्धके लिये खड़े हो जाओ और यशको प्राप्त करो तथा शत्रुओंको जीतकर धन-धान्यसे सम्पन्न राज्यको भोगो। ये सभी मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन् !  तुम निमित्तमात्र बन जाओ।

11.34श्रीकृष्ण

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान्। मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्।।11.34।।

droṇaṁ cha bhīṣhmaṁ cha jayadrathaṁ cha karṇaṁ tathānyān api yodha-vīrān mayā hatāṁs tvaṁ jahi mā vyathiṣhṭhā yudhyasva jetāsi raṇe sapatnān

।।11.34।। द्रोण, भीष्म, जयद्रथ और कर्ण तथा अन्य सभी मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीरोंको तुम मारो। तुम व्यथा मत करो और युद्ध करो। युद्धमें तुम निःसन्देह वैरियोंको जीतोगे।

11.37अर्जुन

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे। अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्।।11.37।।

kasmāch cha te na nameran mahātman garīyase brahmaṇo ’py ādi-kartre ananta deveśha jagan-nivāsa tvam akṣharaṁ sad-asat tat paraṁ yat

।।11.37।। हे महात्मन् ! गुरुओंके भी गुरु और ब्रह्माके भी आदिकर्ता आपके लिये (वे सिद्धगण) नमस्कार क्यों नहीं करें? क्योंकि हे अनन्त ! हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप अक्षरस्वरूप हैं; आप सत् भी हैं, असत् भी हैं, और सत्-असत् से पर भी जो कुछ है, वह भी आप ही हैं।

11.39अर्जुन

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च। नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते।।11.39।।

vāyur yamo ’gnir varuṇaḥ śhaśhāṅkaḥ prajāpatis tvaṁ prapitāmahaśh cha namo namas te ’stu sahasra-kṛitvaḥ punaśh cha bhūyo ’pi namo namas te

।।11.39।। आप ही वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, दक्ष आदि प्रजापति और प्रपितामह (ब्रह्माजीके भी पिता) हैं। आपको हजारों बार नमस्कार हो! नमस्कार हो ! ! और फिर भी आपको बार-बार नमस्कार हो ! नमस्कार हो !

12.1अर्जुन

अर्जुन उवाचएवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।येचाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः।।12.1।।

arjuna uvācha evaṁ satata-yuktā ye bhaktās tvāṁ paryupāsate ye chāpy akṣharam avyaktaṁ teṣhāṁ ke yoga-vittamāḥ

।।12.1।।जो भक्त इस प्रकार निरन्तर आपमें लगे रहकर आप-(सगुण भगवान्-) की उपासना करते हैं और जो अविनाशी निराकारकी ही उपासना करते हैं, उनमेंसे उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?

भक्तियोगमृत्युशब्दार्थ एवं भाष्य
12.3श्रीकृष्ण

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्।।12.3।।

ye tv akṣharam anirdeśhyam avyaktaṁ paryupāsate sarvatra-gam achintyañcha kūṭa-stham achalandhruvam sanniyamyendriya-grāmaṁ sarvatra sama-buddhayaḥ te prāpnuvanti mām eva sarva-bhūta-hite ratāḥ

।।12.3।।जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।

12.7श्रीकृष्ण

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।।12.7।।

teṣhām ahaṁ samuddhartā mṛityu-saṁsāra-sāgarāt bhavāmi na chirāt pārtha mayy āveśhita-chetasām

।।12.7।।हे पार्थ ! मेरेमें आविष्ट चित्तवाले उन भक्तोंका मैं मृत्युरूप संसार-समुद्रसे शीघ्र ही उद्धार करनेवाला बन जाता हूँ।

मनजीवनमृत्युशब्दार्थ एवं भाष्य
12.20श्रीकृष्ण

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः।।12.20।।

ye tu dharmyāmṛitam idaṁ yathoktaṁ paryupāsate śhraddadhānā mat-paramā bhaktās te ’tīva me priyāḥ

।।12.20।।जो मेरेमें श्रद्धा रखनेवाले और मेरे परायण हुए भक्त पहले कहे हुए इस धर्ममय अमृतका अच्छी तरहसे सेवन करते हैं, वे मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।

कर्मज्ञानधर्मसमर्पणमृत्युशब्दार्थ एवं भाष्य
13.9श्रीकृष्ण

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्।।13.9।।

indriyārtheṣhu vairāgyam anahankāra eva cha janma-mṛityu-jarā-vyādhi-duḥkha-doṣhānudarśhanam

।।13.9।।इन्द्रियोंके विषयोंमें वैराग्यका होना, अहंकारका भी न होना और जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा व्याधियोंमें दुःखरूप दोषोंको बार-बार देखना।

मनजीवनमृत्युवैराग्यशब्दार्थ एवं भाष्य
13.13श्रीकृष्ण

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते।अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते।।13.13।।

jñeyaṁ yat tat pravakṣhyāmi yaj jñātvāmṛitam aśhnute anādi mat-paraṁ brahma na sat tan nāsad uchyate

।।13.13।। जो ज्ञेय है, उस-(परमात्मतत्त्व-) को मैं अच्छी तरहसे कहूँगा, जिसको जानकर मनुष्य अमरताका अनुभव कर लेता है। वह (ज्ञेय-तत्त्व) अनादि और परम ब्रह्म है। उसको न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है।

मृत्युविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
13.26श्रीकृष्ण

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते।तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः।।13.26।।

anye tv evam ajānantaḥ śhrutvānyebhya upāsate te ’pi chātitaranty eva mṛityuṁ śhruti-parāyaṇāḥ

।।13.26।।दूसरे मनुष्य इस प्रकार (ध्यानयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग, आदि साधनोंको) नहीं जानते, केवल (जीवन्मुक्त महापुरुषोंसे) सुनकर उपासना करते हैं, ऐसे वे सुननेके परायण मनुष्य भी मृत्युको तर जाते हैं।

भक्तिज्ञानमृत्युशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
13.28श्रीकृष्ण

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति।।13.28।।

samaṁ sarveṣhu bhūteṣhu tiṣhṭhantaṁ parameśhvaram vinaśhyatsv avinaśhyantaṁ yaḥ paśhyati sa paśhyati

।।13.28।।जो नष्ट होते हुए सम्पूर्ण प्राणियोंमें परमात्माको नाशरहित और समरूपसे स्थित देखता है, वही वास्तवमें सही देखता है।

13.32श्रीकृष्ण

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।।13.32।।

anāditvān nirguṇatvāt paramātmāyam avyayaḥ śharīra-stho ’pi kaunteya na karoti na lipyate

।।13.32।।हे कुन्तीनन्दन ! यह पुरुष स्वयं अनादि और गुणोंसे रहित होनेसे अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है। यह शरीरमें रहता हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है।

कर्ममृत्युक्रियाशब्दार्थ एवं भाष्य
14.14श्रीकृष्ण

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते।।14.14।।

yadā sattve pravṛiddhe tu pralayaṁ yāti deha-bhṛit tadottama-vidāṁ lokān amalān pratipadyate

।।14.14।।जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है, तो वह,उत्तमवेत्ताओंके निर्मल लोकोंमें जाता है।

मृत्युविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
14.15श्रीकृष्ण

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते।तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते।।14.15।।

rajasi pralayaṁ gatvā karma-saṅgiṣhu jāyate tathā pralīnas tamasi mūḍha-yoniṣhu jāyate

।।14.15।।रजोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला प्राणी मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है तथा तमोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला मूढ़योनियोंमें जन्म लेता है।

कर्ममनजीवनमृत्युक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
14.20श्रीकृष्ण

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते।।14.20।।

guṇān etān atītya trīn dehī deha-samudbhavān janma-mṛityu-jarā-duḥkhair vimukto ’mṛitam aśhnute

।।14.20।।देहधारी (विवेकी मनुष्य) देहको उत्पन्न करनेवाले इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थारूप दुःखोंसे रहित हुआ अमरताका अनुभव करता है।

14.27श्रीकृष्ण

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च।शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च।।14.27।।

brahmaṇo hi pratiṣhṭhāham amṛitasyāvyayasya cha śhāśhvatasya cha dharmasya sukhasyaikāntikasya cha

।।14.27।।क्योंकि ब्रह्म, अविनाशी अमृत, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक सुखका आश्रय मैं ही हूँ।

15.10श्रीकृष्ण

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः।।15.10।।

utkrāmantaṁ sthitaṁ vāpi bhuñjānaṁ vā guṇānvitam vimūḍhā nānupaśhyanti paśhyanti jñāna-chakṣhuṣhaḥ

।।15.10।।शरीरको छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीरमें स्थित हुए अथवा विषयोंको भोगते हुए भी गुणोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपको मूढ़ मनुष्य नहीं जानते, ज्ञानरूपी नेत्रोंवाले ज्ञानी मनुष्य ही जानते हैं।

ज्ञानजीवनमृत्युशब्दार्थ एवं भाष्य
15.14श्रीकृष्ण

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्।।15.14।।

ahaṁ vaiśhvānaro bhūtvā prāṇināṁ deham āśhritaḥ prāṇāpāna-samāyuktaḥ pachāmy annaṁ chatur-vidham

।।15.14।।प्राणियोंके शरीरमें रहनेवाला मैं प्राण-अपानसे युक्त वैश्वानर होकर चार प्रकारके अन्नको पचाता हूँ।

15.16श्रीकृष्ण

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते।।15.16।।

dvāv imau puruṣhau loke kṣharaśh chākṣhara eva cha kṣharaḥ sarvāṇi bhūtāni kūṭa-stho ’kṣhara uchyate

।।15.16।।इस संसारमें क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी) -- ये दो प्रकारके पुरुष हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर नाशवान् और कूटस्थ (जीवात्मा) अविनाशी कहा जाता है।

15.18श्रीकृष्ण

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः।।15.18।।

yasmāt kṣharam atīto ’ham akṣharād api chottamaḥ ato ’smi loke vede cha prathitaḥ puruṣhottamaḥ

।।15.18।।मैं क्षरसे अतीत हूँ और अक्षरसे भी उत्तम हूँ, इसलिये लोकमें और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ।

मृत्युविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
16.11श्रीकृष्ण

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्िचताः।।16.11।।

chintām aparimeyāṁ cha pralayāntām upāśhritāḥ kāmopabhoga-paramā etāvad iti niśhchitāḥ

।।16.11।।वे मृत्युपर्यन्त रहनेवाली अपार चिन्ताओंका आश्रय लेनेवाले, पदार्थोंका संग्रह और उनका भोग करनेमें ही लगे रहनेवाले और 'जो कुछ है, वह इतना ही है' -- ऐसा निश्चय करनेवाले होते हैं।

16.14श्रीकृष्ण

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी।।16.14।।

asau mayā hataḥ śhatrur haniṣhye chāparān api īśhvaro ’ham ahaṁ bhogī siddho ’haṁ balavān sukhī

।।16.14।।वह शत्रु तो हमारे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओंको भी हम मार डालेंगे। हम सर्वसमर्थ हैं। हमारे पास भोग-सामग्री बहुत है। हम सिद्ध हैं। हम बड़े बलवान् और सुखी हैं।

16.18श्रीकृष्ण

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः।।16.18।।

ahankāraṁ balaṁ darpaṁ kāmaṁ krodhaṁ cha sanśhritāḥ mām ātma-para-deheṣhu pradviṣhanto ’bhyasūyakāḥ

।।16.18।।वे अहङ्कार, हठ, घमण्ड, कामना और क्रोधका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने और दूसरोंके शरीरमें रहनेवाले मुझ अन्तर्यामीके साथ द्वेष करते हैं तथा (मेरे और दूसरोंके गुणोंमें) दोष-दृष्टि रखते हैं।

17.4श्रीकृष्ण

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः।।17.4।।

yajante sāttvikā devān yakṣha-rakṣhānsi rājasāḥ pretān bhūta-gaṇānśh chānye yajante tāmasā janāḥ

।।17.4।।सात्त्विक मनुष्य देवताओंका पूजन करते हैं, राजस मनुष्य यक्षों और राक्षसोंका और दूसरे जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेतों और भूतगणोंका पूजन करते हैं।

17.28श्रीकृष्ण

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह।।17.28।।

aśhraddhayā hutaṁ dattaṁ tapas taptaṁ kṛitaṁ cha yat asad ity uchyate pārtha na cha tat pretya no iha

।।17.28।।हे पार्थ ! अश्रद्धासे किया हुआ हवन, दिया हुआ दान और तपा हुआ तप तथा और भी जो,कुछ किया जाय, वह सब 'असत्' -- ऐसा कहा जाता है। उसका फल न यहाँ होता है, न मरनेके बाद ही होता है अर्थात् उसका कहीं भी सत् फल नहीं होता।

समर्पणमृत्युक्रियाशब्दार्थ एवं भाष्य
18.12श्रीकृष्ण

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्।भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्।।18.12।।

aniṣhṭam iṣhṭaṁ miśhraṁ cha tri-vidhaṁ karmaṇaḥ phalam bhavaty atyāgināṁ pretya na tu sannyāsināṁ kvachit

।।18.12।।कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको कर्मोंका इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित -- ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके बाद भी होता है; परन्तु कर्मफलका त्याग करनेवालोंको कहीं भी नहीं होता।

कर्ममृत्युवैराग्यक्रियाशब्दार्थ एवं भाष्य
18.58श्रीकृष्ण

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि।।18.58।।

mach-chittaḥ sarva-durgāṇi mat-prasādāt tariṣhyasi atha chet tvam ahankārān na śhroṣhyasi vinaṅkṣhyasi

।।18.58।।मेरेमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा और यदि तू अहंकारके कारण मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा।

कर्ममनमृत्युशब्दार्थ एवं भाष्य
18.70श्रीकृष्ण

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः।।18.70।।

adhyeṣhyate cha ya imaṁ dharmyaṁ saṁvādam āvayoḥ jñāna-yajñena tenāham iṣhṭaḥ syām iti me matiḥ

।।18.70।।जो मनुष्य हम दोनोंके इस धर्ममय संवादका अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होऊँगा -- ऐसा मेरा मत है।

भक्तिज्ञानमृत्युशब्दार्थ एवं भाष्य